| मेरे
प्रिय
पाठकों
और
पाठिकाओं
को
मेरा
नमस्कार।
मेरा
नाम
एलेक्स
है।
मैं भी
आपकी
ही तरह
अन्तर्वासना
का
नियमित
पाठक
हूँ।
मुझे
इस
साईट
की
कहानियों
को
पढ़कर
बहुत
मजा
आता
है।
मुझे
ये सभी
कहानियाँ
बहुत
अच्छी
लगी और
मैं
पुरानी
वाली
कहानियाँ
भी
पढ़ना
चाहता
हूँ
इसलिये
मैंने
भी
अपनी
आपबीती
आप
लोगों
के
सामने
पेश
करने
का
इरादा
अन्तर्वासना
के
जरिये
किया
है। यह
मेरी
पहली
कहानी
है, अगर
आपकी
कृपा
हुई तो
मुझे
आगे भी
और
कहानियाँ
भेजने
का
मौका
मिलेगा।
मैं
जिस
लड़की
के
बारे
में
बताने
जा रहा
हूँ,
उसका
नाम
स्नेहा
है। वो
मेरे
पड़ोस
में
रहती
है।
उसका
कद
करीब
5’6″ है,
रंग
गोरा
है और
बदन का
क्या
कहना !
साली
क्या
मस्त
लगती
है कि
जो भी
देखे
तो
उसका
लंड तो
खड़ा हो
ही
जाता
है।
उसके
मम्मे
करीब 34″
के
होंगे
और
उसके
गांड
करीब 38″
की
होगी।
बात उन
दिनों
की है
जब मैं
कोचिंग
में
पढ़ा
करता
था और
छुट्टियाँ
होने
पर मैं
घर
जाता
था। वो
एक
अमीर
घराने
की
माडर्न
ख्याल
की
लड़की
थी और
शायद
इसीलिए
वो
ज्यादातर
जींस व
टी-शर्ट
में
रहती
थी। इस
कारण
उसके
शरीर
के
सारे
उभारों
का
अच्छी
तरह से
प्रदर्शन
होता
था और
यह देख
सभी
लड़के
उस पर
फ़िदा
रहते
थे।
पड़ोस
में
होने
के
कारण
वो
मुझे
भाई
जैसा
मानती
थी और
मैंने
भी कभी
उसे
गलत
नजर से
कभी
नहीं
देखा
था। पर
मुझे
पता था
कि भाई-भाई
करके
वो
मुझे
लाइन
देती
थी।
बात
गर्मियों
की है
जब
छुट्टियाँ
हुई और
मैं घर
गया।
मुझे
लग रहा
था कि
इस
गर्मियों
की
छुट्टियों
का मैं
पूरा
आनंद
लूँगा।
एक दिन
मैं
अपने
नए साल
के
सत्र
के लिए
पढ़ाई
कर रहा
था, वो
आई और
कहने
लगी,”मेरे
घर पर
सब
मेरी
मौसी
के
यहाँ
शादी
में जा
रहे
हैं
इसलिये
मैं आज
यहाँ
ही
सोउंगी।”
वो
बहुत
खुश
नजर आ
रही थी
और
मेरी
किस्मत
भी
देखो
यारो
कि
पापा-मम्मी
को भी
उसकी
मौसी
के
यहाँ
से
आग्रहपूर्वक
न्योता
आया कि
आप भी
आओ और
एलेक्स
को भी
ले
आना।
पर
पापा
स्नेहा
के
यहाँ
होने
से उसे
अकेला
छोड़
नहीं
सकते
थे और
मुझे
पढ़ना
भी था,
सो मैं
यहीं
रुक
गया और
पापा-मम्मी
दोनों
गेराज
से
गाड़ी
निकाल
कर चले
गए।
मम्मी
ने
जाने
से
पहले
बहुत
हिदायतें
दी कि
दरवाजे
खुले
रख कर
मत
सोना,
दोनों
एक ही
कमरे
में सो
जाना
और बेड
अलग
अलग
रखना।
और हम
आज रात
में भी
आ सकते
हैं या
कल आ
जायेंगे
वगैरह-वगैरह।
मैंने
भी हर
आज्ञा
का
पालन
किया,
सिर्फ
एक को
छोड़कर,
बेड
अलग
अलग
वाला।
रात के
नौ बज
चुके
थे और
हम
सोने
की
तैयारी
कर रहे
थे।
उसका
आज मूड
कुछ
बदला-बदला
लग रहा
था।
वैसे
मैं उस
समय
शरीफ
बच्चा
था।
ऊपर के
दरवाजे
जांचने
के लिए
हम
दोनों
ऊपर गए,
क्योंकि
मुझे
रात
में
अकेले
डर
लगता
है। हम
नीचे न
आकर
वहाँ
पर ही
बातें
करने
लग गए।
वह वो
मुझे
बार-बार
स्पर्श
कर रही
थी और
गन्दी-गन्दी
मतलब
यौन
सम्बन्धी
बातें
करने
लगी।
उसी
समय
बिजली
चली
गई। अब
तो वो
बोलने
लगी कि
अगर
नीचे
जायेंगे
तो
मुझे
भी डर
लगेगा
सो हम
वहीं
रुक गए
और
बातें
करने
लगे।
मेरा
तो लंड
वहीं
खड़ा हो
गया पर
शायद
अँधेरा
होने
के
कारण
उसे
दिखाई
नहीं
दिया
होगा।
मैं भी
जवाब
में
थोड़ी-थोड़ी
खुलकर
बातें
करने
लग
गया।
अब
दोनों
में
कुछ-कुछ
होने
लगा था,
हम
दोनों
वहाँ
चिपकने
लगे
थे। हम
दोनों
गर्म
होने
लगे थे
और
वहाँ
आस-पास
में
कोई न
होने
के
कारण
हमने
आखिर
एक
चुम्बन
तो कर
ही
लिया।
इतने
में
बिजली
आ गई और
वहाँ
हमें
कोई
देख
लेता,
उससे
पहले
हम
दरवाज़े
जाँच
कर
नीचे आ
गए।
उसने
नीचे
आते ही
मेरा
एक
लम्बा
चुम्बन
किया।
मैंने
स्नेहा
को
अपनी
बाँहों
में भर
लिया,
अपनी
टांगें
स्नेहा
की
टांगों
से
चिपका
दी और
मैंने
अपने
जलते
हुए
होंठ
स्नेहा
के
होंठों
पर रख
दिए।
फिर
मैं
उसके
नर्म-नर्म
होंठों
को
अपने
होंठों
में भर
कर
चूमने
लगा।
स्नेहा
ने
मुझे
अपनी
बाँहो
में कस
लिया।
मेरे
हाथ
स्नेहा
के
जिस्म
पर फिर
रहे
थे।
कुछ
देर
बाद
मैंने
स्नेहा
को
बिस्तर
पर
सीधा
लिटा
दिया
और मैं
उसके
ऊपर आ
गया।
हम
दोनों
फिर से
किस
करने
लगे और
मेरे
हाथ
उसके
शरीर
पर
कहाँ-कहाँ
फिर
रहे थे,
कुछ
पता
नहीं।
करीब
दस
मिनट
की
चुम्मा-चाटी
के बाद
वो
पूरी
गर्म
हो गई
और
मेरे
कपड़े
उतारने
लगी।
मेरा
भी लंड
अब
जैसे
अन्दर
ही
पैंट
फाड़ने
लगा और
जल्द
ही
उसने
मेरे
सारे
कपड़े
उतार
दिए।
उसने
अपने
हाथों
से
मेरे
लंड को
मसलना
शुरू
कर
दिया।
मैं भी
उसके
मम्मे
दबाने
में
व्यस्त
था।
मैंने
भी देर
ना
करते
हुए
उसके
कपड़े
उतार
दिए।
मैंने
उसको
खेलने
के लिए
अपना
लंड दे
दिया।
मैंने
उसे
बिसतर
पर
लेटा
दिया
और फिर
उसकी
गोरी
चूत
अपनी
जीभ से
चाटने
लगा।
चूत
बिलकुल
साफ़ थी
यानि
एक भी
बाल
नहीं
था।
वो
बोली,”आज
पूरी
तैयारी
करके
आई हूँ
!”
स्नेहा
के
मुँह
से
सिसकारियाँ
निकलने
लगी।
मैं तो
मानो
स्वर्ग
की सैर
कर रहा
था।
आप तो
उसे
देखते
ही
पागल
हो
जाते
और
जंगली
सेक्स
चालू
कर
देते।
पर
जैसे
कि
मैंने
कहा था
कि मै
अन्तर्वासना
का
नियमित
पाठक
हूँ, तो
मैंने
सेक्स
करने
के
नियम
पढ़ रखे
थे जो
किसी
सज्जन
ने
अन्तर्वासना
को
भेंट
किये
थे।
मैंने
बस
अपने
को
नियंत्रित
किया।
उसके
गुलाबी
चुचूकों
को
हल्के-हल्के
मसलने
लगा,
फिर
अपने
होंठों
में भर
कर
चूसने
लगा।
स्नेहा
के
मुँह
से
सिसकारियाँ
निकलने
लगी।
बाद
में वो
मेरा
लौड़ा
चूसने
लग गई,
दो-तीन
मिनट
में ही
मेरी
हालत
ख़राब
हो गई
तो
मैंने
उसे
रोका।
फिर
मैं
उसकी
चूत
चाटने
लगा।
दो-तीन
मिनट
बाद वो
झड़ गई
तो मैं
उसका
अमृत-पान
करने
लगा।
वाह ! एक
अजीब
मजा आ
रहा
था।
वास्तव
में वो
मजा आ
रहा था
जो
जिन्दगी
में
पहले
कभी
नहीं
लिया।
फिर
मैं
स्नेहा
की चूत
पर हाथ
फिराने
लगा।
हाथ
फिराते-फिराते
मैंने
अपनी
उँगलियाँ
स्नेहा
की चूत
के
अन्दर
डाल दी
और
अन्दर-बाहर
करने
लगा।
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