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हम प्रतिदिन ला रहे हैं आपके लिये ज़्यादा मनोरंजन। तो यहां प्रतिदिन तशरीफ़ लाइए और उत्तेजक पलों का भरपूर आनंद उठाएँ.


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मोसे छल किये जा … सैंयां बे-ईमान (प्रेम गुरु)

 
मोसे छल किये जा … सैंयां बे-ईमान

मेरी यह कहानी मेरी एक महिला ई-मित्र मधु अग्रवाल (सोनू) को समर्पित है ---- प्रेम गुरू

देखो मीनू दरअसल तुम बहुत मासूम और परम्परागत लड़की हो। तुम जिस कोमार्य, एक पतिव्रता, नैतिकता, सतीत्व, अस्मिता और मर्यादा की दुहाई दे रही हो वो सब पुरानी और दकियानूसी सोच है। मैं तो कहता हूँ कि निरी बकवास है। सोचो यदि किसी पुरुष को कोई युवा और सुन्दर स्त्री भोगने के लिए मिल जाए तो क्या वो उसे छोड़ देगा? पुरुषों के कौमार्य और उनकी नैतिकता की तो कोई बात नहीं करता फिर भला स्त्री जाति के लिए ही यह सब वर्जनाएं, छद्म नैतिकता और मर्यादाएं क्यों हैं ? वास्तव में यह सब दोगलापन, ढकोसला और पाखण्ड ही है। पता नहीं किस काल खंड में और किस प्रयोजन से यह सब बनाया गया था। आज इन सब बातों का क्या अर्थ और प्रसांगिकता रह गयी है सोचने वाली बात है ? जब सब कुछ बदल रहा है तो फिर हम इन सब लकीरों को कब तक पीटते रहेंगे।
…… इसी कहानी से

मेरी प्यारी पाठिकाओं और पाठको,

उस दिन सन्डे था सुबह के कोई 9 बजे होंगे। मैं ड्राइंग रूम में बैठा अपने लैपटॉप पर मेल्स चेक कर रहा था। मधु (मेरी पत्नी मधुर) चाय बना कर ले आई और बोली “प्रेम मेरे भी मेल्स चेक कर दो ना प्लीज ?”

“क्यों कोई ख़ास मेल आने वाला है क्या ?” मैंने उसे छेड़ा

“ओह … तुम भी … प्लीज देखो ना ?” मधु कुनमुनाई। मधु जब तुनकती है तो उसकी खूबसूरती और भी बढ़ जाती है। आज तो उसके गालों की लाली देखने लायक थी। आँखों में लाल डोरे से तैर रहे थे। मैं जानता हूँ ये कल रात (सनिवार) को जो 2 बजे तक हम दोनों ने जो प्रेमयुद्ध किया था उसका खुमार था। मैंने उसे बाहों में भर लेना चाहा तो वो मुझे से छिटकती हुयी बोली

“ओह … तुम्हें तो बस सारे दिन एक ही काम की लगी रहती है... हटो परे ?”

“अच्छा भई...” मैंने मन मार कर कहा और मधु का आई डी खोलने का उपक्रम करने लगा। इतने में रसोई में कुछ जलने की गंध सी महसूस हुयी। इससे पहले कि मैं लैपटॉप मधु की ओर बढाता वह रसोई की ओर भागी “ओह … दूध उफन गया लगता है ?”
मैंने इनबॉक्स देखा। उसमें किसी मैना का एक मेल आया हुआ था। मुझे झटका सा लगा “ये नयी मैना कौन है ?”

मैं अपने आप को उस मेल को पढ़ने से नहीं रोक पाया। ओह … ये तो मीनल का था। आपको “सावन जो आग लगाए” वाली मीनल (मैना) याद है ना ? आप सभी की जानकारी के लिए बता दूं कि मीनल (मैना) मधु की चचेरी बहन भी है। 2 साल पहले उसकी शादी मनीष के साथ हो गयी है। शादी के बाद मेरा उससे ज्यादा मिलना जुलना नहीं हो पाया। हाँ मधु से वो जरुर पत्र व्यवहार और मोबाइल पर बात करती रहती है।

हाँ तो मैं उस मेल की बात कर रहा था। मीनल ने शुरू में ही किसी उलझन की चर्चा की थी और अपनी दीदी (वो मधु को भाभी के बजाय दीदी बोलती है) से कोई उपाय सुझाने की बात की थी। मैं हड़बड़ा सा उठा। मधु तो रसोई में थी पर किसी भी समय आ सकती थी। मेल जरा लम्बा था। मैंने उसे झट से अपने आई डी पर फारवर्ड कर दिया और मधु के आई डी से डिलीट कर दिया।

आप जरुर सोच रही होंगी कि यह तो सरासर गलत बात है ? किसी दूसरे का मेल बिना उसकी सहमती के पढ़ना कहाँ का शिष्टाचार है ? ओह … आप सही कह रही हैं पर अभी आप इस बात को नहीं समझेंगी। अगर यह मेल मधु सीधे ही पढ़ लेती तो पता नहीं क्या अंजाम होता ? हे लिंग महादेव… तेरा लाख लाख शुक्र है कि यह मेल मधु के हाथ नहीं पड़ा नहीं तो मैं गरीब तो मुफ्त में ही मारा जाता ?

आप भी सोच रही होंगी कि इस मेल में ऐसा क्या था ? ओह... मैं उस मेल को आप सभी को ज्यों का त्यों पढ़ा देता हूँ। हालांकि मुझे इसे सार्वजनिक नहीं करना चाहिए पर मैं उसकी परेशानी पढ़ कर इतना विचलित हो गया हूँ कि आप सभी के साथ उसे सांझा करने से अपने आप को नहीं रोक पा रहा हूँ। मेरी आप सभी पाठिकाओं से विशेष रूप से विनती है कि आप सभी मैना की परशानी को सुलझाने में उसकी मदद करें और उसे अपने अमूल्य सुझाव अवश्य दें। लो अब आप सभी उस मेल को पढ़ लो :

पार्ट-1
प्रिय मधुर दीदी,
मैं बड़ी उलझन में पड़ गयी हूँ। अब तुम ही मुझे कोई राह दिखाओ मैं क्या करुँ? मैं तो असमंजस में पड़ी हूँ कि इस तन और मन की उलझन से कैसे निपटूं ? तुम शायद सोच रही होगी कि कुछ दिनों पहले तो तुम मिल कर गयी ही थी, तो भला इन 4-5 दिनों में ऐसी क्या बात हो गयी ? ओह… हाँ तुम सही सोच रही हो। परसों तक तो सब कुछ ठीक ठाक ही था पर कल की रात तो जैसे मेरे इस शांत जीवन में कोई तूफ़ान ही लेकर आई थी। ओह… चलो मैं विस्तार से सारी बात बताती हूँ :

मेरी सुन्दरता के बारे में तुम तो अच्छी तरह जानती ही हो। भगवान् ने कूट कूट कर मेरे अन्दर जवानी और कामुकता भरी है। किसी ने सच ही कहा है कि स्त्री में पुरुष की अपेक्षा 3 गुना अधिक काम का वास होता है पर भगवान् ने उसे नियंत्रित और संतुलित रखने के लिए स्त्री को लज्जा का गहना भी दिया है। और तुम तो जानती हो मैं बचपन से ही बड़ी शर्मीली रही हूँ। कॉलेज में भी सब सहेलियां मुझे शर्मीलीजान, लाजवंती, बहनजी और पता नहीं किन किन उपनामों से विभूषित किया करती थी। अब मैं अपने शर्मीलेपन और रूप सौन्दर्य का वर्णन अपने मुंह से क्या करूँ। प्रेम भैया तो कहते हैं कि मेरी आँखें बोलती हैं वो तो मुझे मैना रानी और मृगनयनी कहते नहीं थकते। मेरी कमान सी तनी मेरी भोहें तो ऐसे लगती है जैसे अभी कोई कामबाण छोड़ देंगी। कोई शायर मेरी आँखों को देख ले तो ग़ज़ल लिखने पर विवश हो जाए। अब मेरी देहयष्टि का माप तो तुमसे छुपा नहीं है 36-24-36, लम्बाई 5’ 5” भार फूलों से भी हल्का। तुम तो जानती ही हो मेरे वक्ष (उरोज) कैसे हैं जैसे कोई अमृत कलश हों। मेरे नितम्बों की तो कॉलेज की सहेलियां क़समें खाया करती थी। आज भी मेरे लयबद्ध ढंग से लचकते हुए नितम्ब और उनका कटाव तो मनचलों पर जैसे बिजलियाँ ही गिरा देता है। और उन पर लम्बी केशराशि वाली चोटी तो ऐसे लगती है जैसे कोई नागिन लहरा कर चल रही हो। तुम अगर जयपुर के महारानी कॉलेज का रिकार्ड देखो तो पता चल जाएगा कि मैं 2006 में मिस जयपुर भी रही हूँ।

तुम तो जानती ही हो दो वर्ष पूर्व मेरा विवाह मनीष के साथ हो गया। इसे प्रेम विवाह तो कत्तई नहीं कहा जा सकता। बस एक निरीह गाय को किसी खूंटे से बाँध देने वाली बात थी। मुझे तुमसे और प्रेम भैया से बड़ी शिकायत है कि मेरे विवाह में आप दोनों ही शामिल नहीं हुए। ओह… मैं भी क्या व्यर्थ की बातें ले बैठी।

मैं तुम्हें अपने जीवन का एक कटु सत्य बताना आवश्यक समझती हूँ। कॉलेज के दिनों में मेरे यौन सम्बन्ध अपने एक निकट सम्बन्धी से हो गए थे। ओह... मुझे क्षमा कर देना मैं उनका नाम नहीं बता सकती। बस सावन की बरसात की एक रात थी। पता नहीं मुझे क्या हो गया था कि मैं अपना सब कुछ उसे समर्पित कर बैठी। मैं तो सोचती थी कि अपना कोमार्य मधुर मिलन की वेला में अपने पति को ही समर्पित करूंगी पर जो होना था हो गया। मैं अभी तक उस के लिए अपने आप को क्षमा नहीं कर पायी हूँ। पर मेरा सोचना था कि इसके प्रायश्चित स्वरुप मैं अपने पति को इतना प्रेम करुँगी कि वो मेरे सिवा किसी और की कामना ही नहीं करेगा। मैं चाहती थी कि वो भी मुझे अपनी हृदय साम्राज्ञी समझेगा। पर इतना अच्छा भाग्य सब का कहाँ होता है।

मैं पति पत्नी के अन्तरंग संबंधों के बारे में बहुत अधिक तो नहीं पर काम चलाऊ जानकारी तो रखती ही थी। शमा (मेरी एक प्रिय सहेली) ने एक बार मुझ से कहा था

“अरी मेरी भोली बन्नो ! तू क्या सोचती है तेरा दूल्हा पहली रात में तुझे ऐसे ही छोड़ देगा। अरे तेरे जैसी कातिल हसीना को तो वो एक ही रात में दोनों तरफ से बजा देगा देख लेना। सच कहती हूँ अगर मैं मर्द होती या मेरे पास लंड होता तो तेरे जैसी बोम्ब पटाका को कभी का पकड़ कर आगे और पीछे दोनों तरफ से रगड़ देती”

ओह ये शमा भी कितना गन्दा बोलती थी। खैर ! मैंने भी सोच लिया था कि अपने मधुर मिलन की वेला में अपने पति को किसी चीज के लिए मना नहीं करूंगी। मैं पूरा प्रयत्न करुँगी कि उन्हें हर प्रकार से खुश कर दूं ताकि वो उस रात को अपने जीवन में कभी ना भूल पायें और वर्षों तक उसी रोमांच में आकंठ डूबे रहें।

उस रात उन्होंने मेरे साथ दो बार यौन संगम किया। ओह... सब कुछ कितनी शीघ्रता से निपट गया कि मैं तो ठीक से कुछ अनुभव ही नहीं कर पायी। ओह… जैसाकि हर लड़की चाहती है मेरे मन में कितने सपने और अरमान थे कि वो मेरा घूँघट उठाएगा, मुझे बाहों में भर कर मेरे रूप सौन्दर्य की प्रसंसा करेगा और एक चुम्बन के लिए कितनी मिन्नतें करेगा। यौन संबंधों के लिए तो वो जैसे गिड़गिड़ाएगा, मेरे सारे कामांगों को चूमेंगा सहलाएगा और चाटेगा- ऊपर से लेकर नीचे तक। और जब मैं अपना सब कुछ उसे समर्पित करुँगी तो वो मेरा मतवाला ही हो जाएगा। पर ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ। मेरे सारे सपने तो जैसे सुहागरात समाप्त होते होते टूट गए। हम लोग अपना मधुमास मनाने शिमला भी गए थे पर वहाँ भी यही सब कुछ रहा। बस रात को एक दो बार किसी प्रकार पैर ऊपर उठाये, उरोजों को बुरी तरह मसला दबाया और गालों को काट लिया… और... और… फिर….

ओह मुझे तो बड़ी लाज आ रही है मैं विस्तार से नहीं बता सकती। जिन पलों की कोई लड़की कामना और प्रतीक्षा करती है वह सब तो जैसे मेरे जीवन में आये ही नहीं। तुम तो मेरी बातें समझ ही गयी हो ना।

उसने कभी मेरे मन की थाह लेने का प्रयत्न ही नहीं किया। वो तो कामकला जैसे शब्द जानता ही नहीं है। एक प्रेयशी या पत्नी रात को अपने पति या प्रेमी से क्या चाहती है उस मूढ़ को क्या पता। उसे कहाँ पता कि पहले अपनी प्रियतमा को उत्तेजित किया जाता है उसकी इच्छाओं और चाहनाओं का सम्मान किया जाता है। प्रेम सम्बन्ध केवल दो शरीरों का मिलन ही नहीं होता एक दूजे की भावनाओं का भी आदर सम्मान भी किया जाता है और एक दुसरे की पूर्ण संतुष्टि का ध्यान रखा जाता है। सच्चा प्रेम मिलन तो वही होता है जिसमें दोनों पक्षों को आनंद मिले नहीं तो यह एक नीरस शारीरिक क्रिया मात्र ही रह जाती है। पर उस नासमझ को क्या दोष दूँ मेरा तो भाग्य ही ऐसा है।

तुम तो जानती ही हो कि समय के साथ साथ सेक्स से दिल ऊब जाता है और फिर प्रतिदिन एक जैसी ही सारी क्रियाएं हों तो सब रोमांच, कौतुक और इच्छाएं अपने आप मर जाती हैं। वही जब रात में पति को जोश चढ़ा तो ऊपर आये और बाहों में भर कर दनादन 2-4 मिनिट में सब कुछ निपटा दिया और फिर पीठ फेर कर सो गए। वह तो पूरी तरह मेरे कपड़े भी नहीं उतारता। उसे रति पूर्व काम क्रीडा का तो जैसे पता ही नहीं है। मेरी कितनी इच्छा रहती है यौन संगम से पहले कम से कम एक बार वो मेरे रतिद्वार को ऊपर से ही चूम ले पर उसे तो इतनी जल्दी रहती है जैसे कोई ट्रेन छूट रही हो या फिर दफ्तर की कोई फाइल जल्दी से नहीं निपटाई तो कोई प्रलय आ जायेगी। धत... यह भी कोई जिन्दगी है। जब वो पीठ फेर कर सो जाता है तो मैं अपने आप को कितना अपमानित, उपेक्षित और अतृप्त अनुभव करती हूँ कोई क्या जाने।

शमा तो कहती है कि “गुल हसन तो निकाह के 4 साल बाद भी उसका इतना दीवाना है कि सारी सारी रात उसे सोने ही नहीं देता। पता है औरत को चोदने से पहले गर्म करना जरुरी होता है। ये थोड़े ही होता है कि टांगें ऊपर उठाओ और ठोक दो। कसम से गुल तो इस कामकला में इतना माहिर है कि मैं एक ही चुदाई में 3-4 दफा झड़ जाती हूँ। और जब वो अलग अलग तरीकों और आसनों में मेरी चुदाई करता है तो मैं तो इस्स्स्सस….. कर उठती हूँ” मैं तो शमा की इन बातों को सुन कर जल भुन सी जाती हूँ।

विवाह के पश्चात कुछ दिनों तक संयुक्त परिवार में रहने के बाद अब मैं भी इनके साथ ही आ गयी थी। अभी 2-3 महीने पहले इनका तबादला दिल्ली में हो गया है। मनीष एक बहु राष्ट्रीय कंपनी में मैंनेजर है। यहाँ आने के 2-3 दिनों बाद ही अपना परिचय कराने हेतु इन्होने होटल ग्रांड में एक पार्टी रखी थी जिसमें अपने साथ काम करने वाले सभी साथियों को बुलाया था। इनके बॉस का पूरा नाम घनश्याम दास कोठारी है पर सभी उन्हें कोठारी साहेब या श्याम बाबू कह कर बुलाते हैं। श्याम की पत्नी मनोरमा काले से रंग की मोटी ताज़ी ठिगने कद की आलू की बोरी है। देहयष्टि का क्या नाप और भूगोल 40-38-42 है पर अभी भी जीन पेंट और टॉप पहन कर अपने आप को तितली ही समझती है। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि मनीष भी श्याम से अधिक उस मोटी के आगे पीछे लगा था। श्याम 38-40 के लपेटे में जरुर होंगे पर देखने में अभी भी पूरे कामदेव लगते हैं। मोटी मोटी काली आँखें, ऊंचा कद, छछहरा बदन और गोरा रंग। हाँ सिर के बाल जरुर कुछ चुगली खा जाते हैं थोड़ी चाँद सी निकली है। ये गंजे लोग भी सेक्स के मामले में बड़े रंगीन होते हैं। ऑफिस की लड़कियां और औरतें तो जैसे उन पर लट्टू ही हो रही थी। मैंने उचटती नज़रों से देखा था कि श्याम की आँखें तो जैसे मेरे अमृत कलशों और नितम्बों को देखने से हट ही नहीं रही थी।

मनीष ने सबका परिचय करवाया था। मेरे रूप लावण्य को देख कर तो सब की आँखें जैसे चौंधिया ही गयी थी। श्याम से जब परिचय करवाया तो मैंने उनके पाँव छूने की कोशिश की तो उन्होंने मुझे कन्धों से जैसे पकड़ ही लिया। किसी पराये पुरुष का यह पहला स्पर्श था। एक मीठी सी सिहरन मेरे सारे शरीर में दौड़ गयी। मैंने झट से हाथ जोड़े तो उन्होंने मेरे हाथ पकड़ते हुए कहा

“अरे भाभी यह आप क्या कर रही हो यार। मैं इस समय मनीष का बॉस नहीं मित्र हूँ और मित्रों में कोई ओपचारिकता नहीं होनी चाहिए” और फिर उन्होंने कस कर मेरा हाथ दबा दिया। मैं तो जैसे सन्न ही रह गयी। भगवान् ने स्त्री जाती को यह तो वरदान दिया ही है कि वो एक ही नज़र में आदमी की मंशा भांप लेती है, मैं भला उनकी नीयत और आँखें कैसे ना पहचानती। पर इतने जनों के होते भला मैं क्या कर सकती थी।

“ओह… मनीष तू तो किसी स्वर्गलोक की अप्सरा को व्याह कर ले आया है यार” श्याम ने मुझे घूरते हुए कहा। मनीष ने तो जैसे अनसुना ही कर दिया। वो तो बस उस मोटी मनोरमा के पीछे ही दुम हिला रहा था।

पार्टी समाप्त होने के बाद जब हम घर वापस आये तब मैंने श्याम की उन बातों की चर्चा की तो मनीष बोला “अरे यार वो मेरा बॉस है उसे और उनकी मैडम को खुश रखना बहुत जरुरी है। देखो मेरे साथ काम करने वाले सभी की पत्नियां कैसे उसके आगे पीछे घूम रही थी। उस अर्जुन हीरानी की पत्नी संगीता को नहीं देखा साली चुड़ैल ने कैसे उनका सरे आम चुम्मा ले लिया था जैसे किसी अंग्रेज की औलाद हो। तीन सालों में दो प्रोमोशन ले चुका है इसी बल बूते पर। इस साल तो मैं किसी भी कीमत पर अपना प्रोमोशन करवा कर ही रहूँगा ?”

मनीष की सोच सुनकर तो जैसे मेरे पैरों के नीचे से जमीन ही निकल गयी। उस दिन तो बात आई गयी हो गयी। पर अगले सप्ताह श्याम ने अपने घर पर ही पार्टी रख ली। उनकी मोटी मनोरमा का जन्म दिन था ना। इन अभिजात्य वर्ग के लोगों को तो बस मज़े करने के बहाने चाहिए। ओह… मैं तो जाना ही नहीं चाहती थी पर मनीष तो उस पार्टी के लिए जैसे मरा ही जा रहा था। वो भला अपने बॉस को खुश करने का ऐसा सुनहरा अवसर कैसे छोड़ देता। पूरी पार्टी में सभी जी जान से श्रीमान और श्रीमती कोठारी को खुश करने में ही लगे थे। मैंने और मनीष ने भी उन्हें बधाई दी। मनोरमा बोली “ओह मनीष ! ऐसे नहीं यार आज तो गले मिलकर बधाई दो ना ?” और फिर वो मनीष के गले से वो जैसे चिपक ही गयी...

श्याम पास ही तो खड़े थे, बोले “देखो भाई मनीष ये तो हमारे साथ ज्यादती है यार ? तुम अपनी भाभी के मज़े लो और हम देखते रहें ?”

और आगे बढ़ कर श्याम ने मुझे बाहों में भर कर तड़ से एक चुम्बन मेरे गालों पर ले लिया। सब कुछ इतना अप्रत्याशित और अचानक हुआ था कि मैं तो कुछ समझ ही नहीं पायी। उनकी गर्म साँसें और पेंट का उभार मैं साफ़ देख रही थी। वो दोनों मेरी इस हालत को देख कर ठहाका लगा कर हंस पड़े। मैं तो लाज के मारे जैसे धरती में ही समां जाना चाहती थी। किसी पर पुरुष का यह पहला नहीं तो दूसरा स्पर्श और चुम्बन था मेरे लिए तो।

तुम सोच रही होगी मैं क्या व्यर्थ की बातों में समय गँवा रही हूँ अपनी उलझन क्यों नहीं बता रही हूँ। ओह... मैं वही तो बता रही हूँ। इन छोटी छोटी बातों को मैं इसलिए बता रही हूँ कि मेरे मन में किसी प्रकार का कोई खोट या दुराव नहीं था तो फिर मनीष ने मेरे साथ इतना बड़ा छल क्यों किया ? क्या इस संसार में पैसा और पद ही सब कुछ है ? किसी की भावनाओं और संस्कारों का कोई मोल नहीं ?

नारी जाति को तो सदा ही छला गया है। कभी धर्म के नाम पर कभी समाज की परम्पराओं के नाम पर। नारी तो सदियों से पिसती ही आई है फिर चाहे वो रामायण या महाभारत का काल हो या फिर आज का आधुनिक समाज। ओह… चलो छोड़ो इन बातों को मैं असली मुद्दे की बात करती हूँ।

अब मनीष के बारे में सुनो। कई बार तो मुझे लगता है कि बस उसे मेरी कोई आवश्कता ही नहीं है। उसे तो बस रात को अपना काम निकालने के लिए एक गर्म शरीर चाहिए और अपना काम निकलने के बाद उसकी ना कोई चिंता ना कोई परवाह। मुझे तो कई बार संदेह होता है कि उनका अवश्य दूसरी स्त्रियों के साथ भी सम्बन्ध है। कई बार रात को लड़कियों के फ़ोन आते रहते हैं। सुहागरात में ही उन्होंने अपनी कॉलेज के समय के 3-4 किस्से सुना दिए थे। चलो विवाह पूर्व तो ठीक था पर अब इन सब की क्या आवश्कता है। पर शमा सच कहती है “ये मर्दों की जात ही ऐसी होती है इन्हें किसी एक के पल्ले से बंध कर तो रहना आता ही नहीं। ये तो बस रूप के लोभी उन प्यासे भंवरों की तरह होते हैं जो अलग अलग फूलों का रस चूसना चाहते हैं”

मैंने श्याम के बारे में बताया था ना। वो तो जैसे मेरे पीछे ही पड़े हैं। कोई ना कोई बहाना चाहिए उनको तो बस मिलने जुलने का हाथ पकड़ने या निकटता का। मैंने कितनी बार मनीष को समझाया कि मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता पर वो कहता है कि इसमें क्या बुरा है। तुम्हारे हाथ चूम लेने से तुम्हारा क्या घिस जाएगा। यार वो अगर खुश हो गया तो मेरा प्रोमोशन पक्का है इस बार। ओह... मैं तो इस गन्दी सोच को सुन कर ही कांप उठती हूँ। स्त्री दो ही कारणों से अपनी लक्ष्मण रेखा लांघती है या तो अपने पति के जीवन के लिए या फिर अगर वो किसी योग्य ना हो। पर मेरे साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं है फिर मैं इन ‘पति पत्नी और वो’ के लिजलिज़े सम्बन्ध में क्यों पडूं?

मैंने कहीं पढ़ा था कि पुरुष अधिकतर तभी पराई स्त्रीयों की ओर आकर्षित होता है जब उसे अपनी पत्नी से वो सब नहीं मिलता जो वो चाहता है। कई बार उसने मुझे नंगी फ़िल्में दिखा कर वो सब करने को कहा था जो मैंने कभी सोचा भी नहीं था। पर आज मैंने पक्का निश्चय कर लिया था कि मनीष को सही रास्ते पर लाने के लिए अगर यह सब भी करना पड़े तो कोई बात नहीं।

Part-2
आज मनीष ने जल्दी घर आने का वादा किया था। कल मेरा जन्म दिन है ना। आज हम दोनों मेरे जन्मदिवस की पूर्व संध्या को कुछ विशेष रूप से मनाना चाहते थे इसीलिए किसी को हमने इस बारे में नहीं बताया था। मैंने आज अपने सारे शरीर से अनचाहे बाल साफ़ किये थे। (तुम तो जानती हो मैं अपने गुप्तांगों के बाल सेव नहीं करती ना कोई बालसफा क्रीम या लोशन आदि लगाती हूँ। मैं तो बस वैक्सिंग करती हूँ तभी तो मेरी मुनिया अभी भी किसी 14-15 साल की कमसिन किशोरी की तरह ही लगती है एकदम गोरी चिट्टी। फिर मैं उबटन लगा कर नहाई थी। अपने आपको किसी नवविवाहिता की तरह सजाया था। लाल रंग की साड़ी पहनी थी। जूड़े और हाथों में मोगरे के गज़रे, हाथों में मेहंदी और कलाइयों में लाल चूड़ियाँ, माथे पर एक बिंदी जैसे पूर्णीमा का चन्द्र आकाश में अपनी मीठी चांदनी बिखेर रहा हो। शयन कक्ष पूरी तरह सजाया था जैसे कि आज हमारी सुहागरात एक बार फिर से मनने वाली है। इत्र की भीनी भीनी सुगंध, गुलाब और चमेली के फूलों की पत्तियों से सजा हुआ पलंग।

सावन का महिना चल रहा है मैं उन पलों को आज एक बार फिर से जी लेना चाहती थी जो आज से 4-5 साल पहले चाहे अनजाने में या किन्ही कमजोर क्षणों में जिए थे। एक बार इस सावन की बारिस में फिर से नहाने की इच्छा बलवती हो उठी थी जैसी। सच पूछो तो मैं उन पलों को स्मरण करके आज भी कई बार रोमांचित हो जाती हूँ पर बाद में उन सुनहरी यादों में खो कर मेरी अविरल अश्रुधारा बह उठती है। काश वो पल एक बार फिर से आज की रात मेरे जीवन में दुबारा आ जाएँ और मैं एक बार फिर से मीनल के स्थान पर मैना बन जाऊं। मैं आज चाहती थी कि मनीष मुझे बाहों में भर कर आज सारी रात नहीं तो कम से कम 12:00 बजे तक प्रेम करता रहे और जब घड़ी की सुईयां जैसे ही 12:00 से आगे सरके वो मेरी मुनिया को चूम कर मुझे जन्मदिन की बधाई दे और फिर मैं भी अपनी सारी लाज शर्म छोड़ कर उनके “उसको” चूम कर बधाई दूं। और फिर सारी रात हम आपस में गुंथे किलोल करते रहें। रात्री के अंतिम पहर में उनींदी आँखें लिए मैं उनके सीने से लगी रहूँ और वो मेरे सारे अंगों को धीमे धीमे सहलाता और चूमता रहे जब तक हम दोनों ही नींद के बाहुपाश में ना चले जाएँ।

सातों श्रृंगार के साथ सजधज कर मैं मनीष की प्रतीक्षा कर रही थी। लगता था आज बारिश जरुर होगी और इस सावन की यह रिमझिम फुहार मेरे पूरे तन मन को आज एक बार जैसे फिर से शीतल कर जायेगी। दूरदर्शन पर धीमे स्वरों में किसी पुरानी फिल्म का गाना आ रहा था :

झिलमिल सितारों का आँगन होगा
रिमझिम बरसता सावन होगा।


मनीष कोई 8 बजे आया। उनके साथ श्याम भी थे। श्याम को साथ देख कर मुझे बड़ा अटपटा सा लगा। अन्दर आते ही श्याम ने मुझे बधाई दी “भाभी आपको जन्मदिन की पूर्व संध्या पर बहुत बहुत बधाई हो ?”
मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ ? श्याम को मेरे जन्मदिन का कैसे पता चला। ओह… यह सब मनीष की कारगुजारी है। मैंने उनका ओपचारिकतावश धन्यवाद किया और बधाई स्वीकार कर ली। उन्होंने मेरे हाथों को चूम लिया जैसाकि उस दिन किया था पर आज पता नहीं क्यों उनका मेरे हाथों को चूमना तनिक भी बुरा नहीं लगा ?
आपको एक बधाई और देनी थी ?”
“क... क्या मतलब मेरा मतलब है कैसी बधाई ?”
“मनीष आज रात ही एक हफ्ते के लिए ट्रेनिंग पर जा रहा है मुंबई?”
“ट्रेनिंग … ? कैसी ट्रेनिंग ?”
“अरे मनीष ने नहीं बताया ?”
“न… नहीं तो ?”
“ओह मनीष भी अजीब नालायक है यार। ओह सॉरी। अक्चुअली उसके प्रमोशन के लिए ये ट्रेनिंग बहुत जरुरी है।”
“ओह… नो ?”
“अरे तुम्हें तो खुश होना चाहिए ? तुम्हें तो मुझे धन्यवाद देना चाहिए कि मैंने ही उसका नाम प्रपोज़ किया है? क्या हमें मिठाई नहीं खिलाओगी मैनाजी ?”
उनके मुंह पर मैना संबोधन सुनकर मुझे बड़ा अटपटा सा लगा। मेरा यह नाम तो केवल प्रेम भैया या कभी कभी मनीष ही लेता है फिर इनको मेरा यह नाम … मैंने आश्चर्य से श्याम की ओर देखा तो वो बोला
“भई मनीष मुझ से कुछ नहीं छिपाता। हम दोनों का बोस और सहायक का रिश्ता नहीं है वो मेरा मित्र है यार” श्याम एक ही सांस में कह कर मुस्कुराने लगा। और मेरी ओर उसने हाथ बढाया ही था कि अन्दर से मनीष की आवाज ने हम दोनों को चोंका दिया
“मीनू एक बार अन्दर आना प्लीज मेरी शर्ट नहीं मिल रही है?”
मैं दौड़ कर अन्दर गयी। अन्दर जाते ही मैंने कहा “तुमने मुझे बताया ही नहीं की तुम्हें आज ही ट्रेनिंग पर जाना है ?”

“ओह मेरी मैना तुम्हें तो खुश होना चाहिए। देखो यहाँ आना हमारे लिए कितना लकी है कि आते ही ट्रेनिंग पर जाना पड़ गया और फिर वापस आते ही प्रमोशन पक्का” उसने मुझे बाहों में भर कर चूम लिया।
“पर क्या आज ही जाना जरुरी है ? तुम कल भी तो जा सकते हो ? देखो कल मेरा जन्मदिन है और …?” मैंने अपने आप को छुड़ाते हुए कहा
“ओह मीनू डीयर… ऐसा अवसर बार बार नहीं आता तुम्हारा जन्मदिन फिर कभी मना लेंगे ?” उसने मेरे गालों पर हलकी सी चपत लगाते हुए कहा
“ओह … मनीष प्यार-व्यार बाद में कर लेना यार 10:00 बजे की फ्लाइट है अब जल्दी करो।”
पता नहीं यह श्याम कब से दरवाजे के पास खड़ा था। मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा था की मैं रोऊँ या हंसूं ?
अपना सूटकेस पैक करके बिना कुछ खाए पीये मनीष और श्याम दोनों जाने लगे। मैं दौड़ती हुयी उनकी कार तक आई। कार के अन्दर सोनिया (श्याम की सेक्रेटरी) बैठी हुयी अपने नाखूनों पर नेल पोलिश लगा कर सुखा रही थी। मुझे एक झटका सा लगा। इसका क्या काम है यहाँ ? इस से पहले कि मैं कुछ बोलूँ श्याम बोला “भाभी आप भी एअरपोर्ट तक चलो ना ? क्या मनीष को सी ऑफ करने नहीं चलोगी ?”
यह बात तो मनीष को कहनी चाहिए थी पर वो तो इस यात्रा और ट्रेनिंग के चक्कर में इतना खोया था कि उसे किसी बात का ध्यान ही नहीं था। लेकिन श्याम की बात सुनकर वो भी बोला “हाँ.. हाँ मीनू तुम भी चलो आते समय श्याम भाई तुम्हें घर छोड़ देंगे”
मैं मनीष के साथ अगली सीट पर बैठ गयी। रास्ते में मैंने बैक मिरर में देखा था किस तरह वो चुड़ैल सोनिया श्याम की पेंट पर हाथ फिरा रही थी। निर्लज्ज कहीं की।

वापस लौटते समय श्याम ने मुझे बताया “देखो मनीष को तुम्हारी ज्यादा याद ना आये इसलिए मैंने सोनिया को भी उसके साथ ट्रेनिंग पर भेज दिया है। चलो मज़े करने दो दोनों को” और वो जोर जोर से हंसने लगा। मेरे तो जैसे पैरों के तले से जमीन ही खिसक गयी। यह तो सरे आम नंगाई है। रास्ते में मैं कुछ नहीं बोली। मैं तो चाहती थी कि जल्दी से घर आ जाए और इनसे पीछा छूटे।
कोई पोने 11:00 बजे हम घर पहुंचे। श्याम ने कहा “क्या हमें एक कप चाय या कॉफ़ी नहीं पिलाओगी मीनूजी ?”
“ओह … हाँ ? आइये” ना चाहते हुए भी मुझे उसे अन्दर बुलाना पड़ा। मुझे क्रोध भी आ रहा था ! मान ना मान मैं तेरा महमान। अन्दर आकर वो सोफे पर पसर गया। मैंने रसोई में जाने का उपक्रम किया तो वो बोला “अरे भाभी इतनी जल्दी भी क्या है प्लीज बैठो ना ? आराम से बना लेना चाय ? आओ पहले कुछ बातें करते हैं?”
“ओह ?” मैंने आश्चर्य से उनकी ओर देखा “कैसी बातें ?”
“अरे यार बैठो तो सही ?”
उसने मेरी बांह पकड़ कर बैठाने की कोशिश की तो मैं उनसे थोड़ा सा हटकर सोफे पर बैठ गयी।
“मीनू उसने मुझे पहले नहीं बताया कि कल तुम्हारा जन्मदिन है नहीं तो उसकी ट्रेनिंग आगे पीछे कर देता यार ?”
“कोई बात नहीं … पर यह कैसी ट्रेनिंग है ?”
श्याम हंसने लगा “अरे मनीष ने नहीं बताया ?”
मेरे लिए बड़ी उलझन का समय था। अब मैं ना तो हाँ कह सकती थी और ना ही ना। वो मेरी दुविधा अच्छी तरह जानता था। इसीलिए तो मुस्कुरा रहा था।
“अच्छा एक बात बताओ मीनू तुम दोनों में सब ठीक तो चल रहा है ना ?”
“क... क्या मतलब ?”
“मीनू तुम इतनी उदास क्यों रहती हो ? रात को सब ठीकठाक रहता है ना ?”
मुझे आश्चर्य भी हो रहा था और क्रोध भी आ रहा था किसी पराई स्त्री के साथ इस तरह की अन्तरंग बातें किसी को शोभा देती हैं भला ? पर पति का बोस था उसे कैसे नाराज़ किया जा सकता था। मैंने असमंजस में उसकी ओर देखती ही रह गयी। मेरी तो जैसे रुलाई ही फूटने वाली थी। मेरी आँखों में उमड़ते आंसू उसकी नज़रों से भला कैसे छिपते। एक नंबर का लुच्चा है ये तो। देखो कैसे मेरा नाम ले रहा है और ललचाई आँखों से निहार रहा है।

“नहीं ऐसी कोई बात नहीं है … म… मेरा मतलब है सब ठीक है ?” किसी तरह मेरे मुंह से निकला
“ओह मैं समझा … कल तो तुम्हारा जन्मदिन है ना ? और आज ही मनीष को मुंबई जाना पड़ गया। ओह … आइ ऍम सॉरी। पर भई उसके प्रमोसन के लिए जाना जरुरी था। पर तुम चिंता मत करो तुम्हारा जन्म दिन हम दोनों मिलकर मना लेंगे”

मैं क्या बोलती। चुपचाप बैठी उसकी घूरती आँखें देखती रही। कुछ पलों के बाद वो बोला
“देखो मीनू ! मनीष तुम्हारी क़द्र नहीं करता मैं जानता हूँ। तुम बहुत मासूम हो। यह ट्रेनिंग वगेरह तो एक बहाना है यार उसे दरअसल घूमने फिरने और मौज मस्ती करने भेजा है ? समझा करो यार ! घर की दाल खा खा कर आदमी बोर हो जाता है कभी कभी स्वाद बदलने के लिए बाहर का खाना खा लिया जाए तो क्या बुराई है ? तुम क्या कहती हो ?”
मैं उसके कहने का मतलब और नीयत अच्छी तरह जानती थी।

“नहीं यह सब अनैतिक और अमर्यादित है। मैं एक विवाहिता हूँ और उसी दकियानूसी समाज में रहती हूँ जिसकी परंपरा का निर्वाह तो करना ही पड़ता है। मनीष जो चाहे करे मेरे लिए यह कदापि संभव नहीं है। प्लीज आप चले जाएँ” मैंने दृढ़ता पूर्वक कहा पर कहते कहते मेरी आँखें डबडबा उठी।

मैं जानती थी समाज की परंपरा भूल कर जब एक विवाहिता किसी पर पुरुष के साथ प्रेम की फुहार में जब भीगने लगती है तब कई समस्याएं और विरोध प्रश्न आ खड़े होते हैं।

मैं अपने आप पर नियंत्रण रखने का पूरा प्रयत्न कर रही थी पर मनीष की उपेक्षा और बेवफाई सुनकर आखिर मेरी आँखों से आंसू टपक ही पड़े। मुझे लगा अब मैं अपनी अतृप्त कामेक्षा को और सहन नहीं कर पाउंगी। मेरे मन की उथल पुथल वो अच्छी तरह जानता था। बाहर कहीं आल इंडिया रेडियो पर तामिले इरशाद में किसी पुरानी फिल्म का गाना बज रहा था :

मोसे छल कीये जाए… हाय रे हाय...
देखो …... सैंयाँ….. बे-ईमान …...


उसने मेरे एक हाथ पकड़ लिया और मेरी ठोडी पकड़ कर ऊपर उठाते हुए बोला :
“देखो मीनू दरअसल तुम बहुत मासूम और परम्परागत लड़की हो। तुम जिस कोमार्य, एक पतिव्रता, नैतिकता, सतीत्व, अस्मिता और मर्यादा की दुहाई दे रही हो वो सब पुरानी और दकियानूसी सोच है। मैं तो कहता हूँ कि निरी बकवास है। सोचो यदि किसी पुरुष को कोई युवा और सुन्दर स्त्री भोगने के लिए मिल जाए तो क्या वो उसे छोड़ देगा ? पुरुषों के कौमार्य और उनकी नैतिकता की तो कोई बात नहीं करता फिर भला स्त्री जाति के लिए ही यह सब वर्जनाएं, छद्म नैतिकता और मर्यादाएं क्यों हैं ? वास्तव में यह सब दोगलापन, ढकोसला और पाखण्ड ही है। पता नहीं किस काल खंड में और किस प्रयोजन से यह सब बनाया गया था। आज इन सब बातों का क्या अर्थ और प्रसांगिकता रह गयी है सोचने वाली बात है ? जब सब कुछ बदल रहा है तो फिर हम इन सब लकीरों को कब तक पीटते रहेंगे।”

उसने कहना चालू रखा “शायद तुम मुझे लम्पट, कामांध और यौन विकृत व्यक्ति समझ रही होगी जो किसी भी तरह तुम्हारे जैसी अकेली और बेबस स्त्री की विवशता का अनुचित लाभ उठा कर उसका यौन शोषण कर लेने पर आमादा है ? पर ऐसा नहीं है। देखो मीनू मेरे जैसे उच्च पदासीन और साधन संपन्न व्यक्ति के लिए सुन्दर लड़कियों की क्या कमी है ? तुम इस कोर्पोरेट कल्चर (संस्कृति) को नहीं जानती। आजकल तो 5-6 मित्रों का एक समूह बन जाता है और रात को सभी एक जगह इकट्ठा होकर अपने अपने साथी बदल लेते हैं। मेरे भी ऑफिस की लगभग सारी लडकियां और साथ काम करने वालों की पत्नियां मेरे एक इशारे पर अपना सब कुछ लुटाने को तैयार बैठी हैं। मेरे लिए किसी भी सुन्दर लड़की को भोग लेना कौन सी बड़ी बात है?”

“दरअसल मुझे मनोरमा के साथ मजबूरन शादी करनी पड़ी थी और मैंने अपनी प्रेमिका को खो दिया था। जिन्दगी में हरेक को सब कुछ नसीब नहीं होता। मैं आज भी उसी प्रेम को पाने के लिए तड़फ रहा हूँ। जब से तुम्हें देखा है मुझे अपना वो 16 वर्ष पुराना प्रेम याद आ जाता है क्योंकि तुम्हारी शक्ल हूँ बहू उस से मिलती है।”

मैं तो जैसे मुंह बाए उन्हें देखती ही रह गयी। उन्होंने अपनी बात चालू रखी

“देखो मीनू मैं तुम्हें अपने शब्द जाल में फंसा कर भ्रमित नहीं कर रहा हूँ। दर असल प्रेम और वासना में बहुत झीना पर्दा होता है। एक बात तो तुम भी समझती हो कि हर प्रेम या प्यार का अंत तो बस शारीरिक मिलन ही होता है। तुम जिसे वासना कह रही हो यह तो प्रेम की अंतिम अभिव्यक्ति है जहां शब्द मौन हो जाते हैं और प्रेम की परिभाषा समाप्त हो जाती है। दो प्रेम करने वाले एक दूसरे में समां जाते हैं तब दो शरीर एक हो जाते हैं और उनका अपना कोई प्रथक अस्तित्व नहीं रह जाता। एक दुसरे को अपना सब कुछ सोंप कर एकाकार हो जाते हैं। इस नैसर्गिक क्रिया में भला गन्दा और पाप क्या है ? कुछ भ्रमित लोग इसे अनैतिक और अश्लील कहते हैं पर यह तो उन लोगों की गन्दी सोच है”
“ओह श्याम बाबू मुझे कमजोर मत बनाओ प्लीज … मैं यह सब कदापि नहीं सोच सकती आप मुझे अकेला छोड़ दें और चले जाएँ यहाँ से”
“मीनू मैं तुम्हें विवश नहीं करता पर एक बार मेरे प्रेम को समझो। ये मेरी और तुम्हारी दोनों की शारीरिक आवश्कता है। मैं जानता हूँ तुम भी मेरी तरह यौन कुंठित और अतृप्त हो। क्यों अपने इस रूप और यौवन को बर्बाद कर रही हो। क्या तुम्हारा मन नहीं करता कि कोई तुम्हें प्रेम करे और तुम्हारी चाहना को समझे ? मुझे एक बात समझ नहीं आती जब हम अच्छे से अच्छा भोजन कर सकते हैं, मन पसंद कपड़े, वाहन, शिक्षा, मनोरंजन का चुनाव कर सकते हैं तो फिर सेक्स के लिए ही ऐसा प्रतिबन्ध क्यों ? हम इसके लिए भी अपनी पसंद का साथी क्यों नहीं चुन सकते ? दरअसल इस परमानंद की प्राकृतिक चीज को कुछ तथाकथित धर्म और समाज के ठेकेदारों ने विकृत बना दिया है वरना इस नैसर्गिक सुख देने वाली क्रिया में कहाँ कुछ गन्दा या अश्लील है जिसके लिए नैतिकता की दुहाई दी जाती है ?”

“वो… वो … ?”
बाहर जोर से बिजली कड़की। मुझे लगा कि जैसे मेरे अन्दर भी एक बिजली कड़क रही है। श्याम की कुछ बातें तो सच ही हैं यह सब वर्जनाएं स्त्री जाति के लिए ही क्यों हैं ? जब मनीष विवाहित होकर खुलेआम यह सब किसी पराई स्त्री के साथ कर सकता है तो … तो मैं क्यों नहीं ??
“क्या सोच रही हो मीनू ? देखो अपने भाग्य को कोसने या दोष देने का कोई अर्थ नहीं है। मैं जानता हूँ मनीष को समझ ही नहीं है स्त्री जाति के मन की। ऐसे लोगों को प्रेम का ककहरा भी नहीं आता इन्हें तो प्रेम की पाठशाला में भेजना जरुरी होता है ? रही तुम्हारी बात तुम्हें कहाँ पता है कि वास्तव में प्रेम क्या होता है ?”
मैंने अपनी आँखें पहली बार उनकी और उठाई। यह तन और मन की लड़ाई थी। मुझे लगने लगा था कि इस तन की ज्वाला के आगे मेरी सोच हार जायेगी। मेरी अवस्था वो भली भाँती जानता था। उसने मेरे कपोलों पर आये आंसू पोंछते हुए कहना चालू रखा

“मीनू जब से मैंने तुम्हें देखा है और मनीष ने अपने और तुम्हारे बारे में बताया है पता नहीं मेरे मन में एक विचित्र सी हलचल होती रहती है। मैं आज स्वीकार करता हूँ कि मेरे सम्बन्ध भी अपनी पत्नी के साथ इतने मधुर नहीं हैं। मैं शारीरिक संबंधों की बात कदापि नहीं कर रहा। मैं जो प्रेम चाहता हूँ वो मुझे नहीं मिलता। मीनू हम दोनों एक ही नाव पर सवार हैं। हम दोनों मिलकर प्रेम के इस दरिया को पार कर सकते हैं। अब यह सब तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है कि तुम यूँ ही कुढना चाहती हो या इस अनमोल जीवन का आनंद उठाना चाहती हो ? मीनू इसमें कुछ भी अनैतिक या बुरा नहीं है। ये तो शरीर की एक बुनियादी जरुरत है अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें प्रेम आनंद की उन ऊंचाइयों पर ले जा सकता हूँ जिस से तुम अब तक अनजान हो। मैं तुम्हें उस चरमोत्कर्ष और परमानंद का अनुभव करा सकता हूँ जिससे आज तक तुम वंचित रही हो ?”

मैं तो विचित्र दुविधा में उलझ कर रह गयी थी। एक ओर मेरे संस्कार और दूसरी ओर मेरे शरीर और मन की आवश्यकताएं ? हे भगवान्… अब मैं किधर जाऊं? क्या करूँ ? सावन की जिस रात में मैंने किन्हीं कमजोर क्षणों में अपना कौमार्य खो दिया था उन पलों को याद कर के आज भी मैं कितना रोमांच से भर जाती हूँ। शायद वैसे पल तो इन दो सालों में मेरे जीवन में कभी लौट कर आये ही नहीं। श्याम जिस प्रकार की बातें कर रहा है मैं इतना तो अनुमान लगा ही सकती हूँ कि वो प्रेम कला में निपुण हैं। किसी स्त्री को कैसे काम प्रेरित किया जाता है उन्हें अच्छी तरह ज्ञात है। जब मनीष को मेरी कोई परवाह नहीं है तो फिर मैं उसके पीछे क्यों अपने यौवन की प्यास में जलती और कुढ़ती रहूँ ?
प्रकृति ने स्त्री को रूप यौवन के रूप में बहुत बड़ा वरदान दिया है जिसके बल पर वो बहुत इतराती है लेकिन उसके साथ एक अन्याय भी किया है कि उसे अपने यौवन की रक्षा के लिए शक्ति प्रदान नहीं की। कमजोर क्षणों में और पुरुष शक्ति के आगे उसके लिए अपना यौवन बचाना कठिन होता है। पर मेरे लिए ना तो कोई विवशता थी ना मैं इतनी कमजोर थी पर मेरा मन विद्रोह पर उतर आया था। जब नारी विद्रोह पर उतर आती है तो फिर उन मर्यादाओं और वर्जनाओं का कोई अर्थ नहीं रह पाता जिसे वो सदियों से ढोती आ रही है।

और फिर मैंने सब कुछ सोच लिया ……

मैंने अपने आंसू पोंछ लिए और श्याम से पूछा “ठीक है ? आप क्या चाहते हैं ?”
“वही जो एक प्रेमी अपनी प्रेयशी से चाहता है, वही जो एक भंवरा किसी फूल से चाहता है, वही नैसर्गिक आनंद जो एक नर किसी मादा से चाहता है ? सदियों से चले आ रही इस नैसर्गिक क्रिया के अलावा एक पुरुष किसी कमनीय स्त्री से और क्या चाह सकता है ?”
“ठीक है मैं तैयार हूँ ? पर मेरी दो शर्तें होंगी ?”
“मुझे तुम्हारी सभी शर्तें मंजूर हैं … बोलो … ?”
“हमारे बीच जो भी होगा मेरी इच्छा से होगा किसी क्रिया के लिए मुझे बाध्य नहीं करोगे और ना ही इन कामंगों का गन्दा नाम लेकर बोलोगे ? दूसरी बात हमारे बीच जो भी होगा वो बस आज रात के लिए होगा और आज की रात के बाद आप मुझे भूल जायेंगे और किसी दुसरे को इसकी भनक भी नहीं होने देंगे ?”
“ओह मेरी मैना रानी तुम्हारे लिए तो मैं अपनी जान भी दे दूं ?”
इतनी बड़ी उपलब्धि के बाद उसके चहरे की मुस्कान देखने लायक थी। उसे भला मेरी इन शर्तों में क्या आपत्ति हो सकती थी। और फिर उसने मुझे अपनी बाहों में भर लेना चाहा।
मैंने उसे वहीं रोक दिया।
“नहीं इतनी जल्दी नहीं ? मैंने बताया था ना कि जो भी होगा मेरी इच्छानूसार होगा ?”
“ओह … मीनू अब तुम क्या चाहती हो ?”
“तुम ठहरो मैं अभी आती हूँ ?” और मैं अपने शयन कक्ष की और चली आई।
मैंने अपनी आलमारी से वही हलके पिस्ता रंग का टॉप और कोटन का पतला सा पजामा निकला जिसे मैंने पिछले 4 सालों से बड़े जतन से संभाल कर रखा था। मैंने वह सफ़ेद शर्ट और लुंगी भी संभाल कर रखी थी जिसे मैंने उस बारिश में नहाने के बाद पहनी थी। यह वही कपड़े थे जो मेरे पहले प्रेम की निशानी थे। जिसे पहन कर मैं उस सावन की बरसात में अपने उस प्रेमी के साथ नहाई थी। बाहर रिमझिम बारिश हो रही थी। मैं एक बार उन पलों को उसी अंदाज़ में फिर से जी लेना चाहती थी।
बाहर श्याम बड़ी आतुरता से मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। मैंने उसका हाथ पकड़ा और कहा “आओ मेरे साथ”
“क... कहाँ जा रही हो ?”
“ओह मैंने कहा था ना कि तुम वही करोगे जो मैं कहूँगी या चाहूंगी ?”
“ओह... पर बताओ तो सही कि तुम मुझे कहाँ ले जा रही हो ?”
“पहले हम छत के ऊपर चल कर इस रिमझिम बारिश में नहायेंगें ?” मैंने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा। उसकी आँखों में भी अब लाल डोरे तैरने लगे थे। अब उसके समझ में आया कि मैं पहले क्या चाहती हूँ।

हम दोनों छत पर आ गए। बारिश की नर्म फुहार ने हम दोनों का जी खोल कर स्वागत किया। मैंने श्याम को अपनी बाहों में भर लिया। मेरे अधर कांपने लगे थे। श्याम का दिल बुरी तरह धड़क रहा था। उसने अपने लरजते हाथों से मुझे अपने बाहुपास में बाँध लिया जैसे। उसके मुख से एक मधुर सी सुगंध मेरी सांसों में घुल गई। धीरे धीरे मैं अपने आप को उसको समर्पण करने लगी। हम दोनों एक दुसरे के होंठों का रस चूसने लगे। मैं तो उस से इस तरह लिपटी थी जैसे की बरसों की प्यासी हूँ। वो कभी मेरी पीठ सहलाता कभी भारी भारी पुष्ट नितम्बों को सहलाता कभी भींच देता। मेरे मुंह से मीठी सीत्कार निकालने लगी थी। मेरे उरोज उसके चौड़े सीने से लगे पिस रहे थे। मैंने उसकी शर्ट के ऊपर के दो बटन खोल दिए और अपना सिर उसके सीने से लगा कर आँखें बंद कर ली। एक अनोखे आनंद और रोमांच से मेरा अंग अंग कांप रहा था। उसके धड़कते दिल की आवाज मैं अच्छी तरह सुन रही थी। मुझे तो लग रहा था की समय 4 साल पीछे चला है और जैसे मैंने अपने पहले प्रेम को एक बार फिर से पा लिया है।

अब उसने धीरे से मेरा चेहरा अपनी दोनों हथेलियों में भर लिया। मेरे होंठ काँप रहे थे। उसकी भी यही हालत थी। रोमांच से मेरी आँखें बंद हुयी जा रही थी। बालों की कुछ आवारा पानी में भीगी लटें मेरे गालों पर चिपकी थी। उसने अचानक अपने जलते होंठ मेरे होंठों से लगा दिए। इतने में बिजली कड़की। मुझे लगा की मेरे अन्दर जो बिजली कड़क रही है उसके सामने आसमान वाली बिजली की कोई बिसात ही नहीं है। आह … उस प्रेम के चुम्बन और होंठों की छुवन से तो अन्दर तक झनझना उठी। मैंने उसे कस कर अपनी बाहों में भर लिया और अपनी एक टांग ऊपर उठा ली। फिर उसने एक हाथ से मेरी कमर पकड़ ली और दुसरे हाथ को मेरी जांघ के नीचे लगा दिया। मेरी तो जैसी झुरझुरी सी दौड़ गयी। मैंने अपने जीभ उसके मुंह में डाल दी। वो तो उसे किसी रसभरी की तरह चूसने लगा। कोई 10 मिनिट तक हम दोनों इसी तरह आपस में गुंथे एक दुसरे से लिपटे खड़े बारिस में भीगते रहे।

अब मुझे छींकें आनी शुरू हो गयी तो श्याम बोला “ओह मीनू लगता है तुम्हें ठण्ड लग गयी है ? चलो अब नीचे चलते हैं ?”

“श्याम थोड़ी देर और… रररर… रु…..को … ना… आ छी….. ईई ………………………”

“ओह तुम ऐसे नहीं मानोगी ?” और फिर उसने मुझे एक ही झटके में अपनी गोद में उठा लिया। मैंने अपनी नर्म नाज़ुक बाहें उसके गले में डाल कर अपना सिर उसके सीने से लगा दिया। मेरी आँखें किसी अनोखे रोमांच और पुरानी स्मृतियों में अपने आप बंद हो गयी। वो मुझे अपनी गोद में उठाये ही नीचे आ गया।

बेडरूम में आकर उसने मुझे अपनी गोद से नीचे उतार दिया। मैं गीले कपड़े बदलने के लिए बेडरूम से लगे बाथरूम में चली गयी। मैंने अपने गीले कपड़े उतार दिए और शरीर को पोंछ कर अपने बाल हेयर ड्रायर से सुखाये। फिर मैंने अपने आप को वाश बेसिन पर लगे शीशे में एक बार देखा। अरे यह तो वही मीनल थी जो आज से चार वर्ष पूर्व उस सावन की बारिश में नहा कर मैना बन गयी थी। मैं अपनी निर्वस्त्र कमनीय काया को शीशे में देख कर लजा गयी। फिर मैंने वही शर्ट और लुंगी पहन ली जो मैंने 4 सालों से सहेज कर रखी थी। जब मैं बाथरूम से निकली तो मैंने देखा की श्याम ने अपने गीले कपड़े निकाल दिए थे और शरीर पोंछ कर तौलिया लपेट लिया था। वैसे देखा जाए तो अब तौलिये की भी क्या आवश्यकता रह गयी थी।

मैं बड़ी अदा से अपने नितम्ब मटकाती पलंग की ओर आई। मेरे बाल खुले थे जो मेरे आधे चहरे को ढके हुए थे। जैसे कोई बादल चाँद को ढक ले। कोई दिन के समय मेरी इन खुली जुल्फों और गेशुओं को देख ले तो सांझ के धुंधलके का धोखा खा जाए। श्याम तो बस फटी आँखों से मुझे देखता ही रह गया।
मैं ठीक उसके सामने आकर खड़ी हो गयी। लगता था उसकी साँसें उखड़ी हुयी सी हैं। मैंने अचानक आगे बढ़ कर उसके सिर के पीछे अपनी एक बांह डाल कर अपनी और खींचा। उसे तो जैसे कुछ समझ ही नहीं आया कि इस दौरान मैंने अपने दुसरे हाथ से कब उसकी कमर से लिपटा तौलिया भी खींच दिया था। इतनी चुलबुली तो शमा हुआ करती थी। पता नहीं आज मुझे क्या हो रहा था। मेरी सारी लाज और शर्म पता नहीं कहाँ ग़ुम हो गयी थी। लगता था मैं फिर से वही मीनल बन गयी हूँ। इसी आपाधापी में वो पीछे हटने और अपने नंगे बदन को छिपाने के प्रयाश में पलंग पर गिर पड़ा और मैं उसके ठीक ऊपर गिर पड़ी। मेरे मोटे मोटे गोल उरोज ठीक उसके सीने से लगे थे और मेरा चेहरा उसके चहरे से कोई 2 या 4 इंच दूर ही तो रह गया था। उसका तना हुआ “वो” मेरी नाभी से चुभ रहा था।

अब मुझे जैसे होश आया कि यह मैं क्या कर बैठी हूँ। मैंने मारे शर्म के अपने हाथों से अपना मुंह ढक लिया। श्याम ने कोई जल्दी या हड़बड़ी नहीं दिखाई। उसने धीरे से मेरे सिर को पकड़ा और अपने सीने से लगा लिया। उसके सीने के घुंघराले बाल मेरे कपोलों को छू रहे थे और मेरे खुले बालों से उसका चेहरा ढक सा गया था। उसने मेरी पीठ और नितम्बों को सहलाना शुरू कर दिया तो मैं थोड़ी सी चिहुंक कर आगे सरकी तो मेरे होंठ अनायास ही उसके होंठों को छू गए। उसने एक बार फिर मेरे अधरों को अपने मुंह में भर लिया और चूसने लगा। मेरे उरोज अब उसके सीने से दब और पिस रहे थे। मेरा तो मन कर रहा था की आज कोई इनको इतनी जोर से दबाये कि इनका सारा रस ही निकल कर बाहर आ जाए। मेरी बगलों (कांख) से निकलती मादक महक ने उसे जैसे मतवाला ही बना दिया था। मैं भी तो उसके चौड़े सीने से लग कर अभिभूत (निहाल) ही हो गयी थी। पता नहीं कितनी देर हम लोग इसी अवस्था में पड़े रहे। समय का किसे ध्यान रहता है ऐसी अवस्था में ?

अब मैंने उसको कन्धों से पकड़ कर एक पलटी मारी। अब उसका लगभग आधा शरीर मेरे ऊपर था और उसकी उसकी एक टांग मेरी जाँघों के बीच फंस गयी। मेरी लुंगी अपने आप खुल गयी थी। ओह… मारे शर्म के मैंने अपनी मुनिया के ऊपर अपना एक हाथ रखने की कोशिश की तो मेरा हाथ उसके 7” लम्बे और 1.5 इंच मोटे “उस” से छू गया। जैसे ही मेरी अंगुलियाँ उस से टकराई उसने एक ठुमका लगाया और मैंने झट से अपना हाथ वापस खींच लिया। उसने मेरी शर्ट के बटन खोल दिए। मेरे दोनों उरोज तन कर ऐसे खड़े थे जैसे कोई दो परिंदे हों और अभी उड़ जाने को बेचैन हों। वो तो उखड़ी और अटकी साँसों से टकटकी लगाए देखता ही रह गया। मेरी एक मीठी सीत्कार निकल गयी। अब उसने धीमे से अपने हाथ मेरे उरोजों पर फिराया। आह … मेरी तो रोमांच से झुरझुरी सी निकल गयी। अब उसने मेरे कड़क हो चले चुचकों (निप्पल्स) पर अपनी जीभ लगा दी। उस एक छुवन से मैं तो जैसे किसी अनोखे आनंद में ही गोते लगाने लगी। मुझे पता नहीं कब मेरे हाथ उसके सिर को पकड़ कर अपने उरोजों की और दबाने लगे थे। मेरी मीठी सीत्कार निकल पड़ी। उसने मेरे निप्पल्स चूसने चालू कर दिए। मेरी मुनिया तो अभी से चुलबुला कर कामरस छोड़ने लगी थी।

अब उसने एक हाथ से मेरा एक उरोज पकड़ कर मसलना चालु कर दिया और दुसरे उरोज को मुंह में भर कर इस तरह चूसने लगा जैसे कि कोई रसीला आम चूसता है। बारी बारी उसने मेरे दोनों उरोजों को चूसना चालू रखा। मेरे निप्पल्स तो ऐसे हो रहे थे जैसे कोई चमन के अंगूर का दाना हो और रंग सुर्ख लाल। अब उसने मेरे होंठ, कपोल, गला, पलकें, माथा और कानों की लोब चूमानी चालू कर दी। मैं तो बस आह... उन्ह... करती ही रह गयी। अब उसने मेरी बगल में अपना मुंह लगा कर सूंघना चालू कर दिया। आह … एक गुनगुने अहसास से मैं तो उछल ही पड़ी। मेरी बगलों से उठती मादक महक ने उसे कामातुर कर दिया था।
ऐसा करते हुए वो अपने घुटनों के बल सा हो गया और फिर उसने मेरी गहरी नाभि पर अपनी जीभ लगा कर चाटना शुरू कर दिया। रोमांच के कारण मेरी आँखें स्वतः ही बंद होने लगी थी। मैंने उसके सिर को अपने हाथों में पकड़ लिया। मेरी जांघें इस तरह आपस में कस गयी की अब तो उसमें से हवा भी नहीं निकल सकती थी। जैसे ही उसने मेरे पेडू पर जीभ फिराई मेरी तो किलकारी ही निकल आगयी। उसकी गर्म साँसों से मेरा तो रोम रोम उत्तेजना से भर उठा था। मेरी मुनिया तो बस 2-3 इंच दूर ही रह गयी थी अब तो। मुझे आश्चर्य हो रहा था की वो मेरी मुनिया तक जल्दी से क्यों नहीं पहुँच रहा है। मेरे लिए तो इस रोमांच को अब सहन करना कठिन लग रहा था। मुझे तो लगा मेरी मुनिया ने अपना कामरज बिना कुछ किये हो छोड़ दिया है। मैंने अपनी जांघें थोड़ी सी खोल दी। मेरा विस्वास था जब उसकी नज़र मेरी चिकनी रोम विहीन मुनिया पर पड़ेगी तो उसकी आँखें तो फटी की फटी ही रह जायेगी। मेरी मुनिया का रंग तो वैसे भी गोरा है जैसे किसी 14 साल की कमसिन कन्या की हो। गुलाबी रंग की बर्फी के दो तिकोने टुकड़े जैसे किसी ने एक साथ जोड़ दिए हों और बस 3-4 इंच का रक्तिम चीरा। उस कमसिन नाजनीन को देख कर वो अपने आप को भला कैसे रोक पायेगा। गच्च से पूरी की पूरी अपने मुंह में भर लेगा। पर अगले कुछ क्षणों तक न तो उसने कोई गतिविधि की ना ही कुछ कहा। अचानक मेरे कानों में उसकी रस घोलती आवाज़ पड़ी

“मरहबा … सुभान अल्लाह … मेरी मीनू तुम बहुत खूबसूरत हो”

और उसके साथ ही उसने एक चुम्बन मेरी मुनिया पर ले लिया और फिर जैसे कहीं कोयल सी कूकी :
“कुहू … कुहू …”

हम दोनों ही इन निशांत क्षणों में इस आवाज को सुन कर चोंक पड़े और हड़बड़ा कर उठ बैठे। ओह… दीवाल घड़ी ने 12:00 बजा दिए थे। जब कमरे में अंधरे हो तो यह घड़ी नहीं बोलती पर कमरे में तो ट्यूब लाइट का दुधिया प्रकाश फैला था ना। ओह … हम दोनों की हंसी एक साथ निकल गयी। उसने मेरे अधरों पर एक चुम्बन लेते हुए कहा

“मेरी मीनू को जन्मदिन की लाख लाख बधाई हो- तुम जीओ हज़ारों साल और साल के दिन हों पचास हज़ार”

मेरा तो तन मन और बरसों की प्रेम की प्यासी आत्मा ही जैसे तृप्त हो गयी इन शब्दों को सुनकर। एक ठंडी मिठास ने मुझे जैसे अन्दर तक किसी शीतलता से लबालब भर सा दिया। सावन की उमस भरी रात में जैसे कोई मंद पवन का झोंका मेरे पूरे अस्तित्व को ही शीतल कर गया हो। अब मुझे समझ लगा कि उस परम आनंद को कामुक सम्भोग के बिना भी कैसे पाया जा सकता है। श्याम सच कह रहा था कि ‘मैं तुम्हें प्रेम (सेक्स) की उन बुलंदियों पर ले जाऊँगा जिस से तुम अभी तक अपरिचित थी।‘
श्याम पलंग पर बैठा मेरी और ही देख रहा था। मैंने एक झटके में उसे बाहों में भर लिया और उसे ऐसे चूमने लगी जैसेकि वो 38 वर्षीय एक प्रोढ़ पुरुष न होकर मेरे सामने कामदेव बैठा है। मेरी आँखें प्रेम रस से सराबोर होकर छलक पड़ी। ओह मैं इस से पहले इतनी प्रेम विव्हल तो कभी नहीं हुयी थी। सच में एक पराये मर्द का स्पर्श में कितना मधुर आनन्द आता है। यह अनैतिक कार्य मुझे अधिक रोमांचित कर रहा था। उसके अधर मेरे गुलाबी गोरे गालों को चूमने लगे थे।

“ओह... मेरे श्याम … मेरे प्रियतम तुम कहाँ थे इतने दिन … आह... तुमने मुझे पहले क्यों नहीं अपनी बाहों में भर लिया ?”

“तुम्हारी इस हालत को मैं समझता हूँ मेरी प्रियतमा … इसी लिए तो मैंने तुम्हें समझाया था कि सम्भोग मात्र दो शरीरों के मिलन को ही नहीं कहते। उसमें प्रेम रस की भावनाएं होनी जरुरी होती हैं नहीं तो यह मात्र एक नीरस शारीरिक क्रिया ही रह जाती है ?”

“ओह मेरे श्याम अब कुछ मत कहो बस मुझे प्रेम करो मेरे प्रेम देव” मैंने उसे अपनी बाहों में जकड़े चूमती चली गयी। मुझे तो ऐसे लग रहा था जैसे मैं कोई जन्म जन्मान्तर की प्यासी अभिशप्ता हूँ और केवल यही कुछ पल मुझे उस प्यास को बुझाने के लिए मिले हैं। मैं चाहती थी कि वो मेरा अंग अंग कुचल और मसल डाले । अब उसके होंठ मेरे पतले पतले अधरों से चिपक गये थे।

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